तुम्हीं से है जनम पाया पिता माता हमारे हो
झुका ये शीश चरणों पर हमारे प्रिय सहारे हो
करें कैसे तुम्हारी वंदना हम अपनी वाणी से
कहाँ से लायें शब्दों को तुम्हीं मांझी किनारे हो
चढ़ा कर्जे पे कर्जा है तुम्हारे प्यार का हम पर
बदन ये बन गया चन्दन तेरे आशीष को पाकर
उऋण अब हों भला कैसे जनम कितने भी ले लेँ हम
करूँ गर प्राण न्यौछावर रहेगा कम सदा तुम पर
पचासों साल हैं बीते खुशी का आज रेला है
तुम्हारा लाल ये ठहरा तेरे आँचल में खेला है
बहुत आघात पहुंचाए हमें जालिम ज़माने नें
तेरे आशीष से आयी मधुर ये आज बेला है
--अम्बरीष श्रीवास्तव
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