Wednesday, June 1, 2016

ग़ज़ल



ग़ज़ल


बेशक लिखें दीवान में मसला जुबान का
उससे कहें न राज जो कच्चा है कान का 

जर है न औ जमीन न जोरू का है पता
नक्शा रहा है खींच मगर वह मकान का.

जिसकी वजह से मौज-मजा आज मिल रहा
अहसान मानियेगा उसी बेईमान का 

उम्मीद क्या करेगें वफ़ा जो हैं पालतू
हर रोज दिख रहा है असर खानदान का 

हैं पंथ बहुत यार मगर धर्म एक ही
रिश्ता सदा चलेगा यहाँ खानपान का

दुश्वारियों की आंच में तपकर है जो पला
हर माल बेहतरीन है उसकी दुकान का

'अम्बर' से पा के प्यार जमीं फूल फल रही
करिए न ऐसा काम घुटे दम किसान का 

रचनाकार:
इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'

Friday, February 28, 2014

"मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना"


गीत

सतत कर्म करना मुकद्दर बनाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

चली पेट में वो थी धड़कन सुनाती
लुढ़ककर पलटकर वो हमको लुभाती
मशीनों ने जाँचा जो थे जान पाये
बने उसके दुश्मन सभी खार खाये
मिटाने की खातिर छुरी मत उठाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

बढ़ी चाँद जैसी वो प्यारी सी बेटी
जमाने की खुशियाँ थीं हमने समेटी
खनकती हँसी थी चहकती सी बोली
सजाती थी आँगन बनाकर रँगोली
नहीं भूलता है वो छिपना-छिपाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

लिया कर्ज हमने भरी क़िस्त मोटी
किये हाथ पीले बची बस लँगोटी
लिपटकर वो रोई उठी जब थी डोली
जलानी थी किस्मत को उसकी ही होली
बहुत ही कठिन था वहाँ आना-जाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

कहते थे खुद को खुदा के जो बन्दे
हवस के पुजारी थे वहशी दरिन्दे
किया उसका सौदा व सोना कमाया
वहाँ से जो भागी तो जिन्दा जलाया
बचाया उसी ने उसे था बचाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

वो विकलांग बेटी सदा चुप सी रहती
भरा दर्द दिल में जो चुपचाप सहती
हालत जो सँवरी तो उठकर चली थी
पुनः था सवेरा वो चंगी-भली थी
सुनहरे से पथ पर हुई वह रवाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

जगी बुद्धि उसकी लिया एडमीशन
पढ़ी रात दिन वो दिया कम्पिटीशन
बहुत तेज ठहरी गज़ब की समीक्षक
बनी वो ही बेटी पुलिस की अधीक्षक
जमाने ने उसको था जाना व माना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना

अजी बेटियों से सदा मन डरा है
भले रूप लावण्य सोना खरा है
इसी पर तो ससुरा ज़माना मरा है
सावन के अंधे को लगता हरा है
कमीने जमाने को ठोकर लगाना
मेरी बेटियों तुम सदा मुस्कुराना
__________________________
इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'
91, आगा कॉलोनी सिविल लाइन्स सीतापुर उत्तर प्रदेश |
संपर्क : 09415047020,
05862-244440
email : ambarishji@gmail.com

Thursday, November 28, 2013

माँ सरस्वती हरिगीतिका


                                 
                             शुचिशुभ्रवसनाशारदा वीणाकरेवागीश्वरी .                       
                             कमलासिनीहंसाधिरूढ़ा बुद्धिदाज्ञानेश्वरी .
                             अमृतकलशकरअक्षसूत्रं पुस्तकंप्रतिशोभितं .                
                              शरणागतंशुभसत्त्वरूपं वेदमातावंदितं ..


     रचनाकार : इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'  
   दूरभाष: 09415047020, 05862244440

श्री गणेश स्तुति हरिगीतिका



शिवशैलजासुतपूज्यप्रथमं मोक्षज्ञानप्रदायकं .
गुरुगजबदनगणपतिगजानन विध्ननाशविनायकं .
शतवंदनंप्रभुपाशधारी अस्त्रअंकुशशोभितं .
नतनमन 'अम्बर' एकदंतं सिद्धिबुद्धिसुमोहितं ..

रचनाकार : इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'  
दूरभाष: 09415047020, 05862244440

प्रभु हनुमान स्तुति हरिगीतिका

(चित्र गूगल से साभार) 

   शिवरुद्रएकादशत्वमेंयं पवनतनयंध्यायितं .   
नृपकेसरीहरिअंजनासुत पञ्चमुखप्रभुपूजितं .
शनिदम्भहर्तादुष्टदलनं ज्ञानवीरंशोभितं .
शरणागतंसियरामभक्तं हनुमतंसुरवंदितं ..

रचनाकार : इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'   
दूरभाष: 09415047020, 05862244440

पूज्य गुरुदेव स्तुति हरिगीतिका

 (चित्र गूगल से साभार)

गुरुदेवत्वंशुचिज्ञानपुंजं कोटिसवितासमप्रभं .
द्विजजन्मदातापञ्चरिपुहर सिद्धिदायकतमहरं .
सद्बुद्धिशुभसन्मार्गप्रेरक गुरुकृपामममस्तकं .
कुरुध्यानअंबरदंडवतनित आदिगुरुपरब्रह्मत्वं ..

रचनाकार : इंजी० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'    
दूरभाष: 09415047020, 05862244440


 

Monday, February 4, 2013

हास्य-व्यंग्य दोहे


 (चित्र गूगल से साभार)

चिमटा बेलन प्रेम का, खुलकर करें बखान.
जोश भरें हर एक में, ले भरपूर उड़ान..

जगनिंदक घर राखिये, ए सी रूम बनाय.
चाहे सिर पर ही चढ़े, वहीं बीट करि जाय..

चमचों से डरते रहें, कभी करें नहिं बैर.
चमचे पीछे यदि पड़े, नहीं आपकी खैर..

नैनों से सुख ले रहे, नाप रहे भूगोल.
सारे भाई बंधु हैं, नहीं इन्हें कुछ बोल..

गलती कर नहिं मानिए, बने खूब पहचान.
अड़े रहें हल्ला करें, सही स्वयं को मान..

अहंकार दिखता बड़ा, 'मैं' छाया बिन प्राण.
'मैं' 'मैं' 'मैं' ही कीजिये, होगा अति कल्याण..

जब तक सीखें गुरु कहें, नहीं करें कुछ पाप.
गुरु हो बैठे आप जब, बनें गुरू के बाप..

गलत सही साबित करें, अगर चले नहिं जोर.
गुटबंदी तब कीजिये, और मचा दें शोर..

कूटतंत्र की राह पर, छूटतंत्र का राज.
लोकतंत्र है सामने रामराज्य है आज..

हास्य व्यंग्य सम-सामयिक. करते दोहे आज.
इनका उल्टा ही भला, सुखमय बने समाज..

--इं० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'

Sunday, October 7, 2012

ग़ज़ल




हर शख्स नारियों पे अभी मेहरबान है
पानी में कितना कौन है नारी को ज्ञान है.

नवजात बाँधे पीठ करे हाड़तोड़ श्रम,
तकदीर से गिला न ये गीता-कुरान है.    

बच्चे को जो कसे था सो अजगर से जा भिड़ी, 
हिम्मत को कर सलाम ये नारी महान है.

झाड़ू व चूल्हे में जुटे कपड़े धुले सभी,
सेवा भी सबकी साथ में क्या शक्तिमान है. 

बोझिल है आँख नींद से भी फिक्र पर सभी,
सोती है घंटे चार ही मुश्किल में जान है.

तारीफ कर चुके है बड़ी अब तो ध्यान दें,
सहयोग चाहती है मगर बेजुबान है.

अबला अगर शरीर से सबला है कर्म से,
'अम्बर' जो हमसफ़र है वही बेईमान है.
--इं० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'

Tuesday, October 2, 2012

आप सभी को शास्त्री जयन्ती की बधाई !


 अमर 'शास्त्री'
छंद: कुकुभ
(प्रति पंक्ति ३० मात्रा, १६, १४ पर यति अंत में दो गुरु)
'लाल बहादुर' लाल देश के, काम बड़े छोटी काया,
त्याग तपस्या और सादगी, आभूषण जो अपनाया,
एक रूपया वेतन लेकर, सबक त्याग का सिखलाया,
जय जवान औ जय किसान का, नारा इनसे ही पाया.
होनहार बचपन से ही थे, प्यार करें भगिनी भ्राता,
निर्धनता में तैर-तैर कर, पार करें गंगा माता,
यद्यपि कुल कायस्थ जन्म है, सर्व धर्म शोभा पायी,
काशी विद्यापीठ 'शाऽस्त्री', की उपाधि सबको भायी,
प्रति सप्ताह एक दिन व्रत कर, था अकाल को निपटाया ,
युद्ध हुआ जब दुष्ट पाक को, पटका घर तक पहुँचाया,
संधि हेतु जब गए रूस को, हुई घात बिगड़ी काया,
अमर हो गए ताशकंद में, हम सबका दिल भर आया
जन्मदिवस है आज आपका, इस पर शपथ अभी लेलें,
सारे मिलकर एक बनें औ, कभी आग से मत खेलें,
भेदभाव दुर्भाव भुला कर, विश्व बनाएँ अविनाशी,
कर्मयोग सब जन अपनाएँ, हों सच्चे भारतवासी,
--अम्बरीष श्रीवास्तव

Thursday, September 13, 2012

ग़ज़ल


इन्साफ जो मिल जाय तो दावत की बात कर
मुंसिफ के सामने न रियायत की बात कर

तूने किया है जो भी हमें कुछ गिला नहीं
ऐ यार अब तो दिल से मुहब्बत की बात कर

गर खैर चाहता है तो बच्चों को भी पढ़ा
आलिम के सामने न जहालत की बात कर

अपने ही छोड़ देते तो गैरों से क्या गिला
सब हैं यहाँ ज़हीन सलामत की बात कर

'अम्बर' भी आज प्यार की धरती पे आ बसा
जुल्मो सितम को भूल के जन्नत की बात कर

--अम्बरीष श्रीवास्तव 

'हम नहीं सुधरेंगें' (लघुकथा)



बिरादरी में ऊँची नाक रखने वाले, दौलतमंद, पर स्वभावतः अत्यधिक कंजूस, सुलेमान भाई ने अपने प्लाट पर एक घर बनाने की ठानी| मौका देखकर इस कार्य हेतु उन्होंने, एक परिचित के यहाँ सेवा दे रहे आर्कीटेक्ट से बात की| आर्कीटेक्ट नें उनके परिचित का ख़याल करते हुए, बतौर एडवांस, जब पन्द्रह हजार रूपया जमा कराने की बात कही, तो सुलेमान भाई अकस्मात ही भड़क गए, और बोले, "मैं पूरे काम के, कि

सी भी हालत में, एक हजार से ज्यादह रूपये नहीं दूंगा! यह सुनकर वह आर्कीटेक्ट वापस चले गए| इधर सुलेमान भाई ने भी सस्ते में ही, एक दो मंजिला शानदार घर बनवा डाला| इस बात को एक महीना भी नहीं बीता, तभी किसी व्यापारिक कार्यवश दिल्ली प्रवास के दौरान, सुलेमान भाई को खबर मिली कि, उनके शहर में एक तेज भूकंप आया है| हड़बड़ी में गिरते-पड़ते किसी तरह जब वे अपने घर पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि परिचित का घर तो सीना ताने उनके सामने खड़ा था पर, मलवे की शक्ल में तब्दील उनके सपनों का घर, सारे परिवार को स्वयं में दफ़न किये हुए, उनकी कंजूसी को लगातार मुँह चिढ़ा रहा था | यह देखकर वे विक्षिप्त से हो उठे और अपना सिर जमीन पर पटकने लगे |

अकस्मात कन्धे पर किसी का सांत्वना भरा हाथ पाकर, उन्होंने आँसुओं से भरा हुआ स्वयं का चेहरा ऊपर उठाया, तो पाया कि, वही आर्कीटेक्ट, स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से, मलवे से सुरक्षित निकाली हुई, उनकी तीन वर्षीय जीवित पोती को गोद में उठाये हुए, उन्हें सकुशल सौंप रहे थे....... जिसे उन्होंने एकबारगी तो अपने कलेजे से लगा लिया किन्तु अगले ही पल उसे गोद से उतारा और आसमान की तरफ हाथ उठाकर बोले ऐ पाक परवरदिगार! ये क्या किया ! इससे तो अच्छा था मेरे फरीद को बचा लेते ....आखिर मेरा वंश तो चलता !
                                                                 --अम्बरीष श्रीवास्तव

Tuesday, October 25, 2011

आप सभी को दीपावली की बधाई व शुभकामनायें !



स्नेह मिलता रहे, दीप जलते रहें,


प्यार से हम सभी, रोज मिलते रहें,


द्वेष का हो शमन, आज दीपावली,


है सभी को नमन, फूल खिलते रहें..

--अम्बरीष श्रीवास्तव

Wednesday, August 31, 2011

ईद के दिन सभी मुस्कुराते रहें,

ईद के दिन सभी मुस्कुराते रहें,
गीत खुशियों के यूं ही गाते रहें,
आओ कर लें दुआ दूसरों के लिए-
फूल गुलशन में यूं ही खिलाते रहें..
--
अम्बरीष श्रीवास्तव

Monday, August 15, 2011

आजादी कैसी यहाँ?













आजादी कैसी यहाँ, आजादी बस नाम,
भ्रष्टाचारी राज में, सही हुए बदनाम.
सही हुए बदनाम, वही ठहराए दागी.
उनका काम तमाम, जिन्हें है पाया बागी.
ख़त्म करें यह खेल, अंत जिसका बरबादी,
लें अन्ना की राह, तभी पायें आजादी..
--अम्बरीष श्रीवास्तव

Thursday, August 11, 2011

रक्षा बंधन पर्व की शुभकामनायें !












हरिगीतिका:

सावन सुहावन आज पूरन पूनमी भिनसार है,
भैया बहन खुश हैं कि जैसे मिल गया संसार है|
राखी सलोना पर्व पावन, मुदित घर परिवार है,
आलोक भाई की कलाई पर बहन का प्यार है ||

भाई बहन के पाँव छूकर दे रहा उपहार है,
बहना अनुज के बाँध राखी हो रही बलिहार है|
टीका मनोहर भाल पर शुभ मंगलम त्यौहार है
आलोक भाई की कलाई पर बहन का प्यार है ||

सावन पुरातन प्रेम पुनि-पुनि, सावनी बौछार है,
रक्षा शपथ ले करके भाई, सर्वदा तैयार है|
यह सूत्र बंधन तो अपरिमित, नेह का भण्डार है,
आलोक भाई की कलाई पर बहन का प्यार है||

बहना समझना मत कभी यह बन्धु कुछ लाचार है,
मैंने दिया है नेग प्राणों का कहो स्वीकार है |
राखी दिलाती याद पावन, प्रेम मय संसार है,
आलोक भाई की कलाई पर बहन का प्यार है||
--श्री आलोक सीतापुरी
aloksitapuri@gmail.com

 छः 'बरवै' छंद

बहनें लेकर आयीं, पूजन थाल.
रोली-अक्षत सोहै, भाई भाल..

सजी कलाई बाँधी, राखी हाथ.
सदा रहे ओ बहना, तेरा साथ..

मेरा भैया चंदा, जैसा आज.
बहना का चलता है, घर में राज..

तीनों के मुखमंडल, पर मुस्कान.
प्यारा भैया बहनों, की है जान..

मिला अभी जो बहना, का आशीष.
अंबरीश झुक जाता, अपना शीश..

बहना पर न्यौछावर अपने प्राण.
सदा मिले बहना को, यह सम्मान..
--अम्बरीष श्रीवास्तव

कुण्डलिया छंद :

रक्षा बंधन प्यार का , सामाजिक त्यौहार ,
प्रमुदित बहनें इस दिवस,बाँटें हृदय दुलार|
बाँटें हृदय दुलार , ख़ुशी से बांधें राखी ,
बहनों के रक्षार्थ , यही है रक्षण साखी;
'तुका' सरस सन्देश, हमारी सम है कक्षा |
इसी ध्येय से करें , बंधु बहनों की रक्षा ||

--श्री तुकाराम वर्मा
poettrv@gmail.com

कुण्डलिया दिल से रची, प्रभुजी यही यथार्थ,
सब जन मिल कर लें शपथ, बहनों के रक्षार्थ|
बहनों के रक्षार्थ, खड़े हों हम मिल सारे,
कन्या को सम्मान. सभी दें द्वारे-द्वारे;
अम्बरीष अब रोक, भ्रूण हत्या सी बलि, या!
अभी शर्म से डूब, यही कहती कुण्डलिया ||
 --अम्बरीष श्रीवास्तव

Sunday, July 24, 2011

पानी ही पानी दिखे















पानी ही पानी दिखे, मिले न कोई ठौर,
चढ़ आयी है घाघरा, चले न कोई जोर.
चले न कोई जोर, सभी कुछ जल में खोया,
बचे पेड़ ही ठांव, उन्हीं कांधों पर रोया.
अम्बरीष क्यों आज, नदी करती मनमानी ,
काटे हमने पेड़, तो आया चढ़कर पानी.
--अम्बरीष श्रीवास्तव 

Friday, December 10, 2010

"कुछ फूल चढाने आये हम"












इस अंतर में प्रभु रहते हैं अब उन्हें रिझाने आये हम,
पट खोलो तुम मन मंदिर के कुछ फूल चढाने आये हम .

पथ में कंटक बन लोभ-मोह हमको घायल कर जाता है,
अपनेपन की लड़ियाँ लेकर अब राह सजाने आये हम.

पावनता बचपन की दिल में सत्संगति संग लिए अपने,
फैले अब जग में भक्ति भाव कुछ दीप जलाने आये हम.

तज राग द्वेष और अहंकार दिल में हैं सच्चे भाव भरे,
छोड़ा हमने है स्वार्थ मोह अब स्वर्ग बसाने आये हम.

है नर्क परायापन जग में बस स्वर्ग वहीं परमार्थ जहाँ,
प्राणों से प्यारे भारत में नव पौध लगाने आये हम.
--अम्बरीष श्रीवास्तव

"उस माँ को हमने क्या जाना "






उस माँ को हमने क्या जाना जो दुःख ही सारे सहती है.
हैं त्याग दिए निज जीवन सुख और प्यार बाँटती रहती है.
आयी अब याद हमें माँ की माँ के मन में है कब से हम-
दिल माँ का सच्चा मंदिर है ये सारी दुनिया कहती है..
--अम्बरीष श्रीवास्तव

Thursday, October 7, 2010

लखनऊ ब्लोगर्स एसोशियेशन पर इस सप्ताह की श्रेष्ठ पोस्ट की उद्घोषणा



Please check this link.......
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सप्ताह की श्रेष्ठ पोस्ट की उद्घोषणा

कहा जाता है कि प्रतिष्ठा, प्रशंसा और प्रसिद्धि की चाहत सभी को होती है , किन्तु सही मायने में प्रशंसा तब सार्थक समझी जाती है, जब आप किसी को पहले से नहीं जानते हों अचानक किसी मोड़ पर वह मिल जाए और आप उसके सद्गुणों की प्रशंसा करने को बाध्य हो जाएँ । ऐसा ही हुआ कुछ हमारे साथ ।

विगत दिनों यह घोषणा की गयी थी कि प्रत्येक सोमवार को हम लखनऊ ब्लोगर एसोशिएसन पर प्रकाशित किसी एक पोस्ट को सप्ताह की श्रेष्ठ पोस्ट का अलंकरण देंगे । आज पहला दिन है और हम जिस पोस्ट को सप्ताह की पोस्ट का अलंकरण देने जा रहे हैं उसके पोस्ट लेखक को मैंने पहली बार पढ़ा और उस पहले पोस्ट ने मुझे आकर्षित होने पर मजबूर किया वह पोस्ट है -

दिल से कर लो मेल..


एक संग होती रहे पूजा और अजान।
सबके दिल में हैं प्रभू वे ही सबल सुजान..

निर्गुण ब्रह्म वही यहाँ वही खुदा अल्लाह.
वही जगत परमात्मा उनसे सभी प्रवाह..

झगड़े आखिर क्यों हुए क्यों होते ये खेल.
मंदिर-मस्जिद ना करो दिल से कर लो मेल..

पंथ धर्म मज़हब सभी लगें बड़े अनमोल.
इनसे ऊपर है वतन मन की आँखें खोल..

बाँट हमें और राज कर हमें नहीं मंजूर.
सच ये हमने पा लिया समझे मेरे हुजूर.

बहुतेरी साजिश हुई नहीं गलेगी दाल.
एक रहेगा देश ये नहीं चलेगी चाल॥

श्री अंबरीश श्रीवास्तव की यह कविता सांप्रदायिक सद्भाव को समर्पित है और मुझे इस कविता को सप्ताह की श्रेष्ठ कविता या फिर श्रेष्ठ पोस्ट की घोषणा करते हुए अपार ख़ुशी की अनुभूति हो रही है ।

30 जून 1965 में उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के “सरैया-कायस्थान” गाँव में जन्मे कवि अम्बरीष श्रीवास्तव ने भारत के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान 'भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान' कानपुर से विशेषकर भूकंपरोधी डिजाईन व निर्माण के क्षेत्र में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। कवि जनपद सीतापुर के प्रख्यात वास्तुशिल्प अभियंता एवं मूल्यांकक होने के साथ राष्ट्रवादी विचारधारा के कवि हैं। कई प्रतिष्ठित स्थानीय व राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं व इन्टरनेट पर जैसे अनुभूति, हिंदयुग्म, साहित्य शिल्पी, साहित्य वैभव, स्वर्गविभा, हिन्दीमीडिया, विकिपीडिया, रेनेसा, ड्रीमस-इंडिया, शिक्षक प्रभा व मज़मून आदि पर अनेक रचनाएँ प्रकाशित हैं। ये देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित तकनीकी व्यवसायिक संस्थानों जैसे "भारतीय भवन कांग्रेस" , "भारतीय सड़क कांग्रेस", "भारतीय तकनीकी शिक्षा समिति", "भारतीय पुल अभियंता संस्थान" व अमेरिकन सोसायटी ऑफ़ सिविल इंजीनियर्स, आर्कीटेक्चरल इंजीनियरिग इंस्टीटयूट, स्ट्रक्चरल इंजीनियरिग इंस्टीटयूट आदि व तथा साहित्य संस्थाओं जैसे "हिंदी सभा", हिंदी साहित्य परिषद्" (महामंत्री ) तथा "साहित्य उत्थान परिषद्" आदि के सदस्य हैं। प्राप्त सम्मान व अवार्ड:- राष्ट्रीय अवार्ड "इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी अवार्ड 2007", "अभियंत्रणश्री" सम्मान 2007 तथा "सरस्वती रत्न" सम्मान 2009 आदि

.....इस अवसर पर श्री अंबरीश श्रीवास्तव जी के लिए ऋग्वेद की दो पंक्तियां समर्पित है कि - ‘‘आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणी:। हृदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमें ।।’’अर्थात आपके मार्ग प्रशस्त हों, उस पर पुष्प हों, नये कोमल दूब हों, आपके उद्यम, आपके प्रयास सफल हों, सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिले।


अनंत आत्मिक शुभकामनाओं के साथ-
शुभेच्छु-
रवीन्द्र प्रभात
अध्यक्ष : लखनऊ ब्लोगर एसोशिएसन
प्रस्तुतकर्ता: रवीन्द्र प्रभात 22 पाठकों ने अपनी राय दी है, कृपया आप भी दें! इसे ईमेल करें इसे ब्लॉग करें! Twitter पर साझा करें Facebook पर साझा करें Google Buzz पर शेयर करें
Labels: सप्ताह की श्रेष्ठ पोस्ट

Thursday, September 30, 2010

दिल से कर लो मेल..

एक संग होती रहे पूजा और अजान.
सबके दिल में हैं प्रभू वे ही सबल सुजान..

निर्गुण ब्रह्म वही यहाँ वही खुदा अल्लाह.
वही जगत परमात्मा उनसे सभी प्रवाह..

झगड़े आखिर क्यों हुए क्यों होते ये खेल.
मंदिर-मस्जिद ना करो दिल से कर लो मेल..

पंथ धर्म मज़हब सभी लगें बड़े अनमोल.
इनसे ऊपर है वतन मन की आँखें खोल..

बाँट हमें और राज कर हमें नहीं मंजूर.
सच ये हमने पा लिया समझे मेरे हुजूर..

बहुतेरी साजिश हुई नहीं गलेगी दाल.
एक रहेगा देश ये नहीं चलेगी चाल..
--अम्बरीष श्रीवास्तव