Friday, December 10, 2010

"कुछ फूल चढाने आये हम"












इस अंतर में प्रभु रहते हैं अब उन्हें रिझाने आये हम,
पट खोलो तुम मन मंदिर के कुछ फूल चढाने आये हम .

पथ में कंटक बन लोभ-मोह हमको घायल कर जाता है,
अपनेपन की लड़ियाँ लेकर अब राह सजाने आये हम.

पावनता बचपन की दिल में सत्संगति संग लिए अपने,
फैले अब जग में भक्ति भाव कुछ दीप जलाने आये हम.

तज राग द्वेष और अहंकार दिल में हैं सच्चे भाव भरे,
छोड़ा हमने है स्वार्थ मोह अब स्वर्ग बसाने आये हम.

है नर्क परायापन जग में बस स्वर्ग वहीं परमार्थ जहाँ,
प्राणों से प्यारे भारत में नव पौध लगाने आये हम.
--अम्बरीष श्रीवास्तव

11 comments:

  1. है नर्क परायापन जग में बस स्वर्ग वहीं परमार्थ जहाँ,
    प्राणों से प्यारे भारत में नव पौध लगाने आये हम.
    बहुत सुन्दर...

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  2. ऐसे भाव आप सभी मित्रों की संगति से ही उपजते हैं ........इसे पसंद करने के लिए आपका इस सम्पूर्ण हृदय से बहुत-बहुत आभार मित्र.

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  3. अम्बरीश जी अच्छी कविता है बधाई |आप भवन निर्माण से जुड़े हैं
    कैलाश गौतम जी के एक दोहे का आनंद लीजिए
    भवन बनें या पुल बनें ,बनते परमानेंट
    नब्बे प्रतिशत रेत है दस प्रतिशत सीमेंट |

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  4. बहुत सुंदर और दमदार छन्द बद्ध प्रस्तुति अम्‍बरीष भाई| बधाई स्वीकार करें|
    तुषार भी को भी बहुत बहुत धन्यवाद, कैलाश गौतम जी के दोहे को पढ़वाने के लिए|
    http://samasyapoorti.blogspot.com

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  5. धन्यवाद है आपका, स्वागत मित्र तुषार.
    दोहा परमानेंट है, गौतम का आभार..

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  6. भाई नवीन जी आपका स्वागत है ! सराहना के लिए हृदय से आभार मित्रवर !

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  7. तीन महीने बाद तुम आए हो इस ठौर
    जुर्म किया - भुगतो सज़ा, पेश करो कुछ और
    :)))))))))))))))))))

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  8. अरे! यह विद्या मंदिर कैसे छूट गया था मुझसे? हम तो भटक रहे हैं सीखने के लिए और असली जगह पर पहुंचे आज. अम्बरीश जी, बहुत अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें. ऊधो की भूमिका निभाने के लिए नवीन जी को भी धन्यवाद.

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  9. भूला था निज गेह को, जुर्म बड़ा संगीन .
    घर ले आये शुक्रिया, भाई मित्र नवीन.. :-)

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  10. आदरणीय मित्र शेषधर जी! आपका स्वागत है! आपके मनभावन शब्दों में तो मानो जादू ही है जो कि हमारे हृदय में एक नयी ऊर्जा का संचार कर देते हैं ..........भाई नवीन जी के साथ साथ इस निमित्त आपका इस सम्पूर्ण हृदय से बहुत-बहुत आभार मित्रवर !:-)

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  11. भावपूर्ण एवं पवित्र अभिव्यक्ति ।

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